शिव तुम्हारे बिना ग्यारह साल

शिव या शिवानन्द खान को गए हुए आज ग्यारह बरस बीत गए हैं। बहुत से लोगों के लिए शिव की मौत एक खबर नहीं थी या कुछ लोगों के लिए शिव की मौत सिर्फ एक खबर थी। पर बहुत से मुझ जैसे मित्र, साथी के लिए वह हमारी ज़िन्दगी में एक खाली जगह छोड़ गया है। वह जीवात्म के रूप में अभी भी हमारे बीच मौजूद है। कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब मैं उसे महसूस न करता हूँ। शिव ने अपनी पूरी ज़िन्दगी यौनिक अल्पसंख्यक समुदाय (LGBTKQ) समुदायों के अधिकारों की रक्षा और उनके हक़ के लिए आवाज़ उठाने में लगा दिए।

शिव का जन्म कलकत्ता (आज का कोलकाता) में पार्क स्ट्रीट पर नौ जून उन्नीस सौ अड़तालीस को डंकन जॉर्ज के रूप में हुआ था। एक गलती के रूप में उसके सौतेले पिता का सरनेम “खान” उसके साथ जुड़ गया पर वह हमेशा “ख़ान” कहलाने पर गौरवान्वित महसूस करता था। शिव ने बहुत बाद में “शिवानंद” नाम अपने में जोड़ा जो उसकी नानी, जो एक आसामी ब्राह्मण थीं, ने दिया था।

जब शिव नौ साल का था तो उसका परिवार भारत से इंग्लॅण्ड प्रवासित हो गया। उसने अपनी शिक्षा को पूरी करने के लिए यौन कर्मी के रूप में भी कार्य किया। इससे उसे LGBTKQ समुदाय की समस्याओं और मामलों का अंदरूनी दृष्टिकोण समझने का मौका मिला।

शिव ने उन्नीस सौ अठ्ठासी में शक्ति की शुरआत की जिसमे लंदन में रह रहे यौनिक अल्पसंख्यकों के लिए मिलने का अवसर एक डिस्को के रूप में दिया। बाद में “शक्ति खबर” का भी प्रकाशन प्रारम्भ किया गया।

उसी समय एक पाकिस्तानी गे पुरुष “नज़ीर” को लन्दन में रहते हुए अपने HIV संक्रमण के बारे में पता चला। उसको उसके परिवार ने घर से निकाल दिया। लन्दन नगर निगम ने उसकी ज़िम्मेदारी ले ली, परन्तु उस समय वहां के कर्मचारी मुसलमान रीत रिवाज से अनभिज्ञ थे, इसलिए उसे खाने में बहुत सी हराम चीज़ें भेज देते थे। नज़ीर ने नगर निगम से कई बार शिकायत की। लन्दन नगर पालिका ने शिवानंद से संपर्क किया कि वह नज़ीर की ज़िम्मेदारी ले ले। अपने अंतिम दिनों में नज़ीर शिव के साथ रहा। नज़ीर की मृत्यु होने पर कोई भी उसके अंतिम संस्कार में नहीं शामिल हुआ। बड़ी मुश्किल से नमाज़े जनाज़ा पढ़ने के लिए एक मौलवी का इंतज़ाम हुआ। शिव ने नज़ीर को अकेले कब्र में उतारा। शिव ने उसी समय यह तय किया कि किसी भी यौनिक अल्पसंख्यक को इतनी ज़िल्लत भरी मौत नहीं मिलनी चाहिए। नाज़ फाउंडेशन का जन्म एक सामूहिक चेतना को जगाने के लिए क्रोधवश हुआ था।

हम जैसे कई और लोग यौनिक अल्पसंखयकों में बढ़ते HIV संक्रमण को लेकर चिंतित थे।
इसी चिंता और नज़ीर के अंतिम संस्कार में मानव गौरव की अनुपस्थिति के क्रोध से नाज़ फाउंडेशन की स्थापना हुई जिसका उद्देश्य समाज को शिक्षित और संवेदनशील बनाना था। संस्था का मुख्य उद्देश्य यौनिक अल्पसंख्यक समुदाय की भागीदारी बनाना था। वह स्वामित्व में विश्वास करता था। उसका प्रबल विश्वास था की बीमारी और विषाणु का स्वामित्व लेना था जिस से उस से समुचित रूप से निपटा जा सके। हमारे कार्यक्रम का दूसरा पहलु वकालत और नीति निर्माण था। हमने अनुसन्धान पर बल दिया क्योंकि समलैंगिक व्यवहार पर महत्वपूर्ण जानकारी की कमी थी। शिव ने धारा तीन सौ सतहत्तर हटाने की पुरज़ोर वकालत की।
उन्नीस सौ इक्यान्बे में दो स्थान – लन्दन और लखनऊ में शुरू हुए संस्था का उन्नीस सौ छियानबे में, कार्यक्रम को अधिक सुचारू रूप से चलाने के लिए लन्दन में संस्था का विभाजन हुआ – “नाज़ प्रोजेक्ट लंदन” – जो लन्दन में दक्षिण एशिआई LGBTKQ समुदाय को सेवा प्रदान करता है और नाज़ फाउंडेशन इंटरनेशनल जो दक्षिण एशिया में सामुदायिक संस्थाओं का विकास करता है।

उन्नीस सौ पिचानबे – छियानबे में शिव ने बंधू सोशल वेलफेयर सोसाइटी के निर्माण में सहायता की। उन्नीस सौ इक्यान्बे से आ रहे शिव ने लखनऊ उन्नीस सौ सत्तानबे में अपना घर बनाना शुरू किया और सन २००० में लखनऊ पूर्ण रूप से विस्थापित हो गया। वह विश्वास करता था कि दक्षिण एशियाई LGBTKQ समुदाय की अपनी विशिष्ट पहचान होनी चाहिए। एक ज़रूरत महसूस की गयी कि वर्ग और लैंगिक पहचान इस समुदाय का एक विशिष्ट अंग है। ज़्यादातर लोग पुरुष पुरुष यौन व्यवहार को समलैंगिक और इतरलैंगिक भेद के रूप में देखते थे जबकि लैंगिकता जिसमें ज़नानी और मर्दानी पहचान दोनों आते हैं, दक्षिण एशियाई समुदाय का एक ज़रूरी अंग है। हम प्रत्यक्ष दृश्य समुदायों के साथ काम करते हैं जिसमें रानी ब्यवहार वाले स्त्रियोचित पुरुष शामिल थे।

दो हज़ार एक में जब नाज़ के कर्मचारी गिरफ्तार हुए तो भी यह मुश्किल काम को रोक नहीं सकी। अब तक नाज़ फाउंडेशन दो सौ बाइस से अधिक सामुदायिक संस्थाओं का विकास कर चुका है ।

सन दो हज़ार पांच में नाज़ के स्थापित होने के पंद्रह वर्ष बाद प्रिंस चार्ल्स द्वारा शिव को “आर्डर ऑफ़ ब्रिटिश एम्पायर” उपाधि से सम्मानित किया गया।

वर्ष गुजरने के साथ शिव निजी ज़िन्दगी में अकेला महसूस करने लगा। निजी ज़िन्दगी में उसे एक साथी की कमी अखरने लगी।

बीस मई दो हज़ार तेरह को पैंसठ वर्ष की आयु में नए दोस्तों की गफलतों के कारण शिव ने अपना जीवन अंत करने का फैसला किया। उसने अपने जीवन का अंतिम SMS मुझे (आरिफ़ जाफ़र ) को किया “अब नहीं सहा जाता – मैं जा रहा हूँ, हमेशा के लिए। ” अपनी वसीयत में उसने मुझे (आरिफ़ जाफ़र ) को अंतिम संस्कार करने की ज़िम्मेदारी सौंपी जो मैंने यथा संभव पूरी की।

इस तरह विश्व ने मानव अधिकारों के एक उत्साही अभिवक्ता को खो दिया – हमेशा के लिए।

लेकिन शिव तुम हम सब में ज़िंदा रहोगे – हमेशा। …….